गरीबों, किसानों और शोषितों के नेता थे राम नरेश यादव: श्याम नंदन यादव की कलम से…✍️

Patna/newsaaptak.live desk:-..✍️70 के दशक में स्वर्गीय रामनरेश यादव किसानों, गरीबों और शोषितों के नेता के तौर पर उभरे थे। उनका जन्म 1 जुलाई 1928 में उत्तर प्रदेश, आजमगढ़ के आँधीपुर गांव में हुआ था। पिता गया प्रसाद यादव प्राइमरी पाठशाला में अध्यापक थे, और उनके विचारों में आज़ादी के आन्दोलन और समाजवाद की पूरी छाप थी। जिसका प्रभाव राम नरेश यादव पर भी पड़ा, और माता भागवन्ती देवी गृहिणी थीं। घर में खेती किसानी का माहौल था।

गांव में पढ़ाई पूरी करने के बाद वाराणसी हिन्दू विश्वविद्यालय से बीए, एमए और एलएलबी की पढ़ाई की उस समय प्रसिद्ध समाजवादी चिन्तक एवं विचारक आचार्य नरेन्द्र देव काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति थे। विश्वविद्यालय के संस्थापक एवं जनक पंडित मदनमोहन मालवीय के गीता पर उपदेश तथा भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं तत्कालीन प्रोफेसर डॉ॰ राधाकृष्णन के भारतीय दर्शन पर व्याख्यान की गहरी छाप उन पर विद्यार्थी जीवन में पड़ी।

श्री यादव ने स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात वाराणसी में चिन्तामणि एंग्लो बंगाली इन्टरमीडिएट कालेज में प्रवक्ता के पद पर तीन वर्षों तक सफल शिक्षक के रूप में कार्य किया। फिर पट्टी नरेन्द्रपुर इंटर कालेज जौनपुर में भी कुछ समय तक प्रवक्ता रहे। इसी दौरान कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद सन् 1953 में आजमगढ़ में वकालत प्रारम्भ किया और अपनी कर्मठता तथा ईमानदारी के बल पर अपने पेशे तथा आम जनता में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया।

श्री यादव ने छात्र जीवन से समाजवादी आन्दोलन में शामिल होकर अपने राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन की शुरूआत की। आजमगढ़ जिले के गांधी कहे जाने वाले बाबू विश्राम राय का भी भरपूर सानिध्य मिला। श्री यादव ने महात्मा गांधी और डॉ. रामनोहर लोहिया के विचारों को अपना आदर्श माना। समाजवादी विचारधारा के अन्तर्गत विशेष रूप से जाति तोड़ो, विशेष अवसर के सिद्धान्त, बढ़े नहर रेट, किसानों की लगान माफी, समान शिक्षा, आमदनी एवं खर्चा की सीमा बांधने, वास्तविक रूप से जमीन जोतने वालों को उनका अधिकार दिलाने, अंग्रेजी हटाओ आदि आन्दोलनों को लेकर अनेकों बार गिरफ्तारियां दी।

आपातकाल के दौरान मीसा और डी.आई. आर के अधीन जून 1975 से फरवरी 1977 तक आजमगढ़ जेल और केन्द्रीय कारागार नैनी इलाहाबाद में निरूद्ध रहे।*70 के दशक में रामनरेश यादव किसानों, गरीबों और शोषितों के नेता के तौर पर उभरे थे। उस वक्त रामनरेश आजमगढ़ से सांसद थे। 1977 के चुनाव के बाद हुए उपचुनाव में राम नरेश यादव जनता पार्टी के टिकट पर पहली बार एटा के विधान सभा क्षेत्र निधौलीकलां से विधान सभा के सदस्य चुने गए।श्री यादव लोकबन्धु राजनारायण के भी बेहद करीबी रहें है।

चौधरी चरण सिंह राम नरेश से प्रभावित होकर 1977 में स्व. राम नरेश यादव को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया। *राम नरेश यादव ने यूपी में किसानों और पिछडो के लिए ऐतिहासिक काम है। जिसे कभी भूल नही जा सकता है।* 1977 में जनता पार्टी के घोषणा पत्र में किसानों को 18 घंटे बिजली देने का वादा किया गया था। उसी क्रम में उद्योगपतियों को दिए जाने वाली बिजली में 32 मेगावाट की कटौती कर किसानों खेती करने के लिए 18 घंटे बिजली दिलवाया ताकि किसान आराम से खेती कर सकें।

उनके इस फैसले को सभी उद्योगपतियों ने तो मान लिया लेकिन एक एल्युमिनियम के बर्तन बनाने वाला एक बड़ा उद्योगपति को ये बात नागवार लगी। उसने अपने अधिकारियों और कर्मचारियों को भेजना शुरू कर दिया। एक दिन लगभग 100 कर्मचारी श्री यादव के पास आये और बोलने लगे कि साहब कारखाने में काम घट रहा है। हम लोगो को नौकरियों से निकाल दिया जायेगा। हमारा परिवार भूखा मर जायेगा।

श्री यादव ने कहा कि पहले मेरी सर्विस जायेगी तब आपकी सर्विस जाएगी।उद्योगपति ने तत्कालीन केंद्रीय बिजली मंत्री से उनकी शिकायत कर दी। मंत्री ने श्री यादव से कहा कि *” यादव जी आप अच्छा नही कर रहे है। अगर फैक्ट्री में विधुत आपूर्ति रोक दिया गया तो एल्युमिनियम के बर्तन कैसे बनेंगे ? ” राम नरेश यादव ने बेबाक़ी के साथ जवाब दिया कि भोजन होगा तभी तो बर्तन की ज़रूरत पड़ेगी।* बात प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के पास पहुँची पर श्री यादव अपने फैसले से टस से मस नही हुए।बल्कि उद्योगपति का पुराना बिल निकलवा कर कार्यवाही शुरू कर दिया। जिसका परिणाम रहा कि उद्योगपति को सरकार का बकाया भुगतान तो करना ही पड़ा साथ ही बिजली देने का दबाव भी छोड़ना पड़ा।

वहीं एक तरफ *दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग मण्डल कमीशन को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई ने सोशलिस्टों के अत्यंत दबाब में अनमने ढंग से गठित किया था। लेकिन रामनरेश यादव ने मण्डल साहब की सिफारिशों से पहले ही नेहरू जी द्वारा रिजेक्ट कर दिए गए प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग काका कालेलकर आयोग की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए न केवल सरकारी नौकरियों में 15% आरक्षण/विशेष अवसर के संवैधानिक प्राविधान अनुच्छेद 340 को क्रियान्वित कर दिया वरन उन्होंने उसे पदोन्नति में भी प्रदान कर दिया।*26 अगस्त 1977 के शासनादेश में जिसमें पिछडो को 15% सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के बाद राम नरेश यादव ने दूसरा शासनादेश जारी कर 13 जनवरी 1978 को यह भी निश्चित कर दिया कि अब पदोन्नतियों में भी एस. सी./एस. टी. की तरह पिछडो को भी 15%आरक्षण देय होगा।

देश के इतिहास में बिहार के मुख्यमंत्री श्री कर्पूरी ठाकुर और यूपी के इतिहास में राम नरेश यादव पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्हें यथास्थितिवादियों ने जी भर के गालियां दी हैं। साथ ही राम नरेश यादव के लिए ये नारा भी लगाया गया कि *रामनरेश वापस जाओ,लाठी लेकर भैंस चराओ* तो कर्पूरी ठाकुर के लिए कहा गया कि *कर्पूरी-करपूरा, चलाओ छूरा”,कर्पूरी वापस जाओ,छूरा लेकर बाल बनाओ।

देश के इतिहास में शायद राम नरेश यादव व कर्पूरी ठाकुर पहले व्यक्ति होंगे जिन लोगो ने अपने-अपने प्रदेशो में मनुवाद को लाठी लेकर हांका था, उसकी जड़ हो चुकी व्यवस्था की हजामत बनायी थी। राम नरेश यादव ने लाठी में कलम बांधकर अनुच्छेद 340 के प्राविधानों को मूर्त रूप दिया था। वहीं कर्पूरी ठाकुर ने उस्तरे में कलम बांधकर अनुच्छेद 340 पर उग आए झाड़-झंखाड़ को काट डाला था।

राम नरेश यादव की कलम की लाठी ने कुछ मुट्ठी भर अभिजात्य मानसिकता के लोगो को इतना चोटिल किया था कि वे भूल बैठे थे कि राम नरेश यादव भैंस चराने वाले यादव नही है बल्कि आजमगढ़ कचहरी में काला कोट पहन के संविधान की व्याख्या करने वाले कलम की लाठी रखने वाले यादव है। उन्हे शायद अहसास नही था कि यह यादव जब कलम की लाठी चलायेगे तो सर नही फटेगा,खून नही रिसेगा बल्कि जड़ व्यवस्था की चूलें हिल जाएंगी। हजारों वर्षों से ठहरे हुए पानी में ज्वार-भाटा आ जायेगा, मूक लोग वाचाल हो जाएंगे, जमीन पर बैठने वाले लोग कुर्सियों पर बैठ जाएंगे, हुजूर कहने वाले लोग खुद हुजूर बन जाएंगे।

राम नरेश यादव की कलम की लाठी ने खेत में चरने वाली भैंस ही नही बल्कि ऑफिस में काम करने वाले एक वर्ग विशेष जो मनुवादियों को खदेड़ डाला और यूपी में सामाजिक न्याय की पौधशाला तैयार कर डाली। जिसका परिणाम रहा कि उन्हें दो साल के भीतर ही अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी। स्व. राम नरेश यादव ने 1977 से 1979 तक निधौली कलां (एटा) का विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया तथा 1985 से 1988 तक शिकोहाबाद से विधायक रहे। 1988 से 1994 तक (लगभग तीन माह छोड़कर) उत्तरप्रदेश से राज्यसभा सदस्य रहे और 1996 से 2007 तक फूलपुर (आजमगढ़) का विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया। उसके बाद 2011 में केन्द्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार ने राम नरेश यादव को मध्य प्रदेश का राज्यपाल बना दिया गया।म.प्र. के राज्यपाल बनने के बाद राजनैतिक विद्वेष की भावना से वहाँ हुए , व्यापमं घोटाले में भी उनका नाम जोड़ दिया गया और एफआईआर दर्ज करवाया गया। उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश द्वारा उस मामले की जांच करवाई गई जिसमें वह निर्दोष साबित हुए और उनपर की गई एफआईआर निरस्त किया गया।

पूरे जीवन सच्चाई सादगी और ईमानदार छवि को इस क़दर दाग़दार होने का सदमा वो सहन नही कर पाएं और 22 नवंबर 2016 को 88 साल की उम्र में राम नरेश यादव की मृत्यु हो गई।

श्यामनंदन कुमार यादव (प्रदेश महासचिव राजद बिहार सह प्रभारी युवा यादव महासभा झारखंड)

 6,798 total views,  2 views today

Share and Enjoy !

Shares
Shares