गांधीजी के प्राण रक्षक के वंशजों को वादानुसार भूमि आवंटित करें सरकार: निसार अख्तर अंसारी.

Arwal /newsaaptak.live desk:-राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के, कत्ल करने वाले के नाम से तो दुनिया वाकिफ है, लेकिन उनकी जान लेने का इससे पहले जब प्रयास किया गया था, तब उनकी जान बचाने वाला का नाम इतिहास से गायब है !

जिला कांग्रेस कमेटी अरवल के कोषाध्यक्ष और प्रदेश कांग्रेस के स्टेट डेलिगेट एडवोकेट निसार अख्तर अंसारी ने गांधी जी के प्राण रक्षक बत्तख मियां अंसारी के 152 वीं जयंती पर उन्हें खराजे अकिदत पेश करते हुए बताया कि बत्तख मियां अंसारी चंपारण के मोतिहारी में अंग्रेजों के नील फैक्ट्रियों के मैनेजर इरविन के यहां रसोइया का काम करते थे, मगर थे पक्के राष्ट्रभक्त!

गांधीजी 1917 ई में दक्षिण अफ्रीका से सिधे चम्पारण के नीलहों किसानों की दुर्दशा का जायजा लेने आए थे तब तत्कालीन अंग्रेजी फैक्ट्रियों के मैनेजर इरविन ने उन्हें रात के खाना पर आमंत्रित किया, इरविन उन्हें खाना में मीठी जहर देकर गांधी जी को मारना चाहता था, ऐसी जहर जो धीरे-धीरे असर करता है इससे गांधीजी की जान तुरंत नहीं कुछ दिनों के भी चली जाती है, जिससे उनकी हत्या का आरोप भी नहीं लगता !

अंग्रेज मैनेजर इरविन ने बत्तख मियां अंसारी को दूध में जहर मिलाकर गांधी जी को पीने के लिए देने को कहा, बत्तख मियां अंसारी जब इनकार किया तो उनके बेटे को बंधक बना कर उन्हें इसके लिए मजबूर किया गया ! तब जहर मिला दूध देने के लिए मजबूर होकर उन्होंने जहर मिला दूध तो गांधी जी को दिया, मगर उनकी आंखों में आंसू थे, जिससे गांधीजी को कुछ शंका तो हुई, मगर वे चुप रहें, लेकिन बतख मियां अंसारी ने गांधीजी और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के कानों में कह दिया कि उस दूध में जहर मिला हुआ है, इस तरह उन्होंने गांधीजी के प्राणों की रक्षा करने का काम किया.

क्रोधित होकर अंग्रेज मैनेजर इरविन ने उनके घर को ध्वस्त करवा दिया उनके पास कुछ खेती की जमीन थी उसे भी हड़प लिया, तथा तरह-तरह की यातनाएं बतख मियां अंसारी और उनके परिवार के अन्य लोगों को अंग्रेजों ने दिया!

आजादी के बाद डॉ राजेंद्र प्रसाद देश के राष्ट्रपति बने तो अपनी मोतिहारी यात्रा में बतख मियां अंसारी अंसारी को खोज किया तथा जिला प्रशासन को इन्हें 35 एकड़ जमीन आवंटित करने का आदेश दिया, क्योंकि इनके पास उस समय जो भी जमीनें थी उसे अंग्रेजों ने जब्त कर लिया था, परंतु प्रशासनिक उदासीनता के कारण उन्हें तो जीते जी यह जमीन नहीं ही मिली.

अफसोस है कि आज तक उनके वंशजों को भी नहीं मिला ! निर्धनता की हालत में 1957 ई में उनका इंतकाल हो गया और जिनके पूर्वज अपनी जान पर खेलकर राष्ट्रपिता की जान बचाने का काम किया, वैसे राष्ट्रभक्त स्वतंत्रता सेनानी बतख मियां अंसारी के वंशज आज दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं ! उनके दो पोता सरकार से कुछ अनुदान प्राप्त करने की आस में है, जो दैनिक दिहाड़ी मजदूरी कर के अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहें हैं. मैं बिहार सरकार से उनकी 152 वीं जयंती पर यह मांग करता हूं उनके वंशजों को वादे के मुताबिक 35 एकड़ भूमि के साथ ही साथ उन्हें उचित पेंशन की व्यवस्था किया जाए.

 3,048 total views,  4 views today

Share and Enjoy !

0Shares
0
0Shares
0