अरुण मिश्रा को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बनाए जाने पर मोदी पर कसा तंज:- श्याम नंदन यादव, कहा “संवैधानिक संस्थाओं” को बर्बाद करने के लिए किसी हद तक गिर सकते हैं मोदी..

Patna /newsaaptak.live/desk:- अरुण मिश्रा को मोदी ही जुलाई 2014 में कॉलेजियम के सहारे सुप्रीम कोर्ट लेकर आये थे. उससे पहले तीन बार उन्हें मनमोहन सिंह सरकार की अनिच्छा पर सुप्रीम कोर्ट रिजेक्ट कर चुका था. उनकी योग्यता यही थी कि वे मोदी,अडानी और संघ के खास थे और हैं. अरुण मिश्रा वही आदमी हैं जिसने 2015 में संजीव भट्ट की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें 2002 में मुसलमानों के ख़िलाफ़ हुए गुजरात दंगों की जांच को फिर से खोले जाने के लिए अदालत के निर्देश की मांग की गयी थी.

अरुण मिश्रा वही आदमी हैं जिसने सहारा-बिड़ला पत्रों” की जांच की याचिका को खारिज कर दिया था. उस मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के अधिकारियों द्वारा मारे गये छापे के दौरान आदित्य बिड़ला समूह के कार्यालयों से बरामद दस्तावेज़ सामने आये थे. इन दस्तावेज़ों से पता चला था कि बड़ी मात्रा में विभिन्न लोक सेवकों और राजनेताओं को अलग-अलग समय पर रक़म का भुगतान किया गया था. इनमें प्रधानमंत्री,मोदी भी शामिल थे. उक्त बातें राजद के प्रदेश महासचिव सह सामाजिक कार्यकर्ता श्याम नंदन यादव ने कहा है.

उन्होंने आगे यह भी बताया है कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते मोदी ने 25 करोड़ लिए थे. अरुण मिश्रा वही आदमी हैं जिसकी खंडपीठ के सामने सबसे संवेदनशील न्यायमूर्ति बीएच लोया की हत्या का मामला ‘लिस्ट’ किया गया.कहा गया उनकी पसंद से ये मामला 10 वें नंबर के जज रहने के बावजूद मिला. बाद में विवाद बढ़ने पर अरुण मिश्रा ने ख़ुद को जस्टिस लोया मामले से ‘रेक्युज़’ यानी अलग कर लिया था.लेकिन ऐसे ही दूसरे मामले जमीन अधिग्रहण के एक मामले में उन्होंने फ़ैसला सुनाया था. बाद में ये मामला उसी संविधान पीठ को सौंप दिया गया, जिसके वो भी सदस्य थे.अरुण मिश्रा ने ख़ुद को उस संविधान पीठ से ‘रेक्युज़’ यानी अलग करने से इंकार कर दिया था. मतलब ये कि ख़ुद के दिए गए फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई में वे ख़ुद भी शामिल थे.

अरुण मिश्रा वही आदमी हैं जिसने अडानी समूह के 7 केस की सुनवाई की,और सभी में फैसला अडानी के पक्ष में गया.8000 करोड़ का फायदा अडानी को हुआ,जिसका भार राजस्थान के उपभोक्ताओं और बिजली वितरण संस्थाओं को वहन करना पड़ा.अरुण मिश्रा वही आदमी हैं जिसने कॉलेजियम में रहते हुए अपने भाई विशाल मिश्रा को मध्यप्रदेश हाई कोर्ट में जज बनाया. 45 साल के उम्र की बाध्यता भी बदल दिया. जब तक ये आदमी सुप्रीम कोर्ट में रहा अपने पसंद के राजनैतिक दृष्टि से अतिसंवेदनशील केस की सुनवाई करते रहें.आरक्षण, एससी ,एसटी अधिकारों को कमजोर किया. दीपक मिश्रा के साथ मिलकर मास्टर ऑफ़ रोस्टर की धज्जियां उड़ाई. उन्होंने प्रश्न खड़ा किया है कि ऐसे व्यक्ति को मोदी ने मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बनाकर बता दिया है, कि भारत में आने वाले दिन मानवाधिकार के कैसे रहने वाले हैं?

कौन हैं अरुण मिश्रा और क्यों मचा है बवाल :- अरुण मिश्रा एक वकील के तौर पर 1978 में अपना करियर शुरू किया था वह सबसे कम उम्र में 1998- 99 में बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन चुने गए और अक्टूबर 1999 में ही हाई कोर्ट मध्यप्रदेश में जज बन गए उसके बाद राजस्थान और कोलकाता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रहे 7 जुलाई 2014 को प्रमोट करके उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया इस पद से वह 20 सितंबर 2020 को रिटायर हुए हैं और 31 मई 2021 को उन्हे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का चेयरमैन चुना गया, 1 मई को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलते ही वह 2 जून से पदभार संभाल लिए हैं.

ज्ञात हो कि जस्टिस अरुण मिश्रा को पीएम मोदी वाली 5 सदस्य कमेटी ने उन्हें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष चुना है, वहीं कमेटी में विपक्ष के एक मात्र सदस्य ने खुद को अलग कर लिया है आरोप यह लग रहा है कि जस्टिस अरुण मिश्रा ने पीएम मोदी की जमकर तारीफ की थी जिसके एवज में यह महत्वपूर्ण पद मिला है.

मोदी के पांच सदस्यीय कमेटी में कौन – कौन थे शामिल:-कमेटी के अध्यक्ष नरेंद्र मोदी खुद हैं वही सदस्य के रूप में गृह मंत्री अमित शाह, लोकसभा स्पीकर ओम बिडला, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश के साथ-साथ राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल थे. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार विपक्ष के नेता के तौर पर शामिल मल्लिकार्जुन खड़गे ने असहमति जताई है.

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