माउंटेन मैन दशरथ मांझी का स्मारक स्थल गेहलौर घाट,है प्रेम का प्रतीक: मंडल पुरी.

Gaya/मोहडा/अतरी/वजीरगंज पाठक क़ी कलम से….प्रेम क़ा प्रतीक माउंटेन मैन दशरथ मांझी क़ा स्मारक स्थल गेह्लौर घाट जिस शख्सियत की आदमकद प्रतिमा के पास मैं और मेरा मित्र खड़े हैं,उनका नाम जुबान पर आते ही दिल और दिमाग में एक अद्भुत भाव उमड़ता है ।एक संघर्षशील व्यक्तित्व, दृढ़ संकल्पित, जुझारूपन के साथ साथ प्रेम की अद्वितीय उदाहरण जैसा की भगवान श्री राम और शायद शाहजहाँ के बाद इनकी द्वारा बनाई गई कीर्ति थी.. अब तो धीरे धीरे प्यार और प्रेम क़ा प्रतिक सा यह स्थल पर्यटक स्थल बन गया है ।इनका अजीब प्रेम कहानी और उस प्रेम के वियोग में किया गया कार्य हर प्रेमी युगल के नाम पर है.. और यही प्यार का उदाहरण देते हैं.. यह महापुरुष पर्वत पुरुष के नाम से नवाजे ही नही गए, बल्कि इस उदाहरण को उन्होंने अपने अद्भुत कार्यों के दम पर छीन लिया ।

पर्वत पुरुष दशरथ मांझी को वजिरगंंज के लोग उनके नाम और कार्य पर काफी गर्व करते हैं। खासकर युवा वर्ग जब हम अपने सहकर्मी साथी पटना फतुहा का रहने वाला सुधांशु को पिछले साल बताएं थे क़ि मैं वजीरगंज से हूँ तब उसने ‘मांझी: द माउंटेन मैन’ फिल्म के बारे बात कही फिर काफी उत्सुकतावश इस फिल्म में दर्शाये गए दृश्यों और कहानी की हकीकत पूछने लगा. मैंने अपने मित्र को सारी कहानी बताई और फिल्म की हकीकत और कुछ कुछ कल्पनिक दृश्यों के बारे में बताया। उस वक्त ही उन्होंने एक बार दशरथ मांझी की कर्मभूमि स्थल क़ा भ्रमण कराने का आग्रह किया, क्योंकि ये बात पिछले साल की थी लिहाजा कोरोना काल के बाद उन्हे भ्रमण करवाने का वादा किया था… ठीक पिछले माह उसका अप्रैल 2021 में संयोगवश गया आना हुआ और मैं भी घर पर ही था , मेरे मित्र ने मुझे फोन किया की आपके जिला में हूँ दो घण्टे बाद ट्रेन है । मुझे तुरन्त पिछले साल की बात याद आई और मैंने उन्हे घर आने को कहा और उन्होंने भी स्वीकार किया आना ….फिर मैंने उनके साथ सबसे पहले उसी मुकाम पर लेकर चले जहाँ वजीरगंज का नाम सुनते ही उसी की कल्पना करते थे,उत्सुक तो इतने थे की महेर पहाड़ को देखकर बोल पड़े यही पहाड़ है क्या??

मैंने थोड़ी मुस्कान के साथ ना में सर हिलाकर वजीरगंज के उत्तर दिशा क़ी तरफ फैले पर्वत शृंखला के तरफ इशारा किया….फिर आखिरकार वहाँ पर पहुँच ही गए ,जहाँ छेनी हथौड़ी का मार से पर्वत का सीना चिरकर रास्ता बनाया गया था, ठीक उसके बीचो बीच अपनी वाहन रोक दी, क्योंकि हम तो पहले से परिचित थी उस स्थान से पर मेरे दोस्त का उत्साह देखते बन रहा था वो एकदम पहाड़ के काटे गए भागों पर छेनी का धार देखकर रोमांचित हो रहे थे.. उन्होंने हाथों से छू छु कर देखा और एकदम आश्चर्य से भरकर सबकुछ पूछने लगे और मैं बताता गया.. फिर जो मित्र कभी तस्वीर नही खिचवाने में रुचि लेते थे उन्हे पोज बदल बदल कर तस्वीर कैद करवाते देख मुझे एकदम से अलग आत्मसंतुष्टि और असीम खुशी हुई ….फिर हमसब दशरथ मांझी की प्रतिमा के पास पहुँचे वहाँ पहुँचने पर उनके प्रतिमा वाले स्थल पर देखरेख कर रहे उनके पुत्र भागीरथ मांझी मिले उन्होंने अपने पिता दशरथ मांझी कई रोमांचक कहानी हमलोग को सुनाएँ, मेरे मित्र ने मांझी जी की परिवार और घर के बारे पूछा तब मैंने उनके आर्थिक स्थिति और सरकार द्वारा उपेक्षित परिवार आज भी निम्न स्तर के जीवन जी रहें हैं।

ऐतिहासिक पुरुष के परिवार क़ी आर्थिक दशा पर मेरे मित्र ऩे सरकार से इनके जीवन स्तर में विकास के लिए विशेष पहल करने क़ी बात कही। ….. आखिरकार हमलोग दोनो मित्र काफी देर घुमने के बाद अपने दिल दशरथ मांझी पर्यटन स्थल क़ी यादें लेकर अपने घर की ओर चल पड़े और साथ में यहाँ क़ी रोमांचक यादें.. …(मंडल पुरी के साथ सुधांशु कुमार, वजीरगंज, गया)

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