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S-400 मिसाइल सिस्टम खरीदने पर भारत पर प्रतिबंध लगाएगा अमेरिका? – खबरों से समझौता नहीं

S-400 मिसाइल सिस्टम खरीदने पर भारत पर प्रतिबंध लगाएगा अमेरिका?

रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम को खरीदने पर अमेरिका कई बार भारत पर प्रतिबंध लगाने की धमकी दे चुका है। अमेरिका में निजाम बदलने बाद से कयास लगाए जा रहे थे कि क्या जो बाइडन भी भारत रूस डिफेंस डील को लेकर अपने पूर्ववर्ती डोनाल्ड ट्रंप की राह पर चलेंगे? इस बीच भारत के तीन दिवसीय दौरे पर पहुंचे अमेरिका के नए रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन ने अपने बयान से बहुत कुछ साफ कर दिया है। उन्होंने साफ लहजे में कहा है कि एस-400 मिसाइल सिस्टम को खरीदने संबंधी भारत की योजना को लेकर उसके खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों की संभावना पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ कोई चर्चा नहीं हुई है।

अमेरिकी रक्षा मंत्री ने इशारों में भारत से क्या कहा?
अमेरिकी रक्षा मंत्री ने कहा कि एस-400 मिसाइल सिस्टम की कोई आपूर्ति नहीं हुई है और इसलिए प्रतिबंधों का मुद्दा चर्चा का विषय नहीं था। हमारे साथ ऐसे देश हैं जिनके साथ हम समय-समय पर काम करते हैं जिनके पास रूसी उपकरण हैं। निश्चित रूप से हम अपने सभी सहयोगियों और साझेदारों से रूसी उपकरणों से दूर रहने और किसी भी तरह के अधिग्रहण से बचने का आग्रह करते हैं जिससे हमारी ओर कोई प्रतिबंध लग सकता है। रूस से एस-400 मिसाइल प्रणाली की खरीद के लिए अमेरिका ने तुर्की पर प्रतिबंध लगाए हैं।

अमेरिकी रक्षा मंत्री ने इशारों में भारत से क्या कहा?
अमेरिकी रक्षा मंत्री ने कहा कि एस-400 मिसाइल सिस्टम की कोई आपूर्ति नहीं हुई है और इसलिए प्रतिबंधों का मुद्दा चर्चा का विषय नहीं था। हमारे साथ ऐसे देश हैं जिनके साथ हम समय-समय पर काम करते हैं जिनके पास रूसी उपकरण हैं। निश्चित रूप से हम अपने सभी सहयोगियों और साझेदारों से रूसी उपकरणों से दूर रहने और किसी भी तरह के अधिग्रहण से बचने का आग्रह करते हैं जिससे हमारी ओर कोई प्रतिबंध लग सकता है। रूस से एस-400 मिसाइल प्रणाली की खरीद के लिए अमेरिका ने तुर्की पर प्रतिबंध लगाए हैं।

क्या है S-400 डिफेंस सिस्टम
यह एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम है, जो दुश्मन के एयरक्राफ्ट को आसमान से गिरा सकता है। S-400 को रूस का सबसे अडवांस लॉन्ग रेंज सर्फेस-टु-एयर मिसाइल डिफेंस सिस्टम माना जाता है। यह दुश्मन के क्रूज, एयरक्राफ्ट और बलिस्टिक मिसाइलों को मार गिराने में सक्षम है। यह सिस्टम रूस के ही S-300 का अपग्रेडेड वर्जन है। इस मिसाइल सिस्टम को अल्माज-आंते ने तैयार किया है, जो रूस में 2007 के बाद से ही सेवा में है। यह एक ही राउंड में 36 वार करने में सक्षम है।

रूस ने अप्रैल 2007 में किया था तैनात
400 किलोमीटर तक मार करने वाले इस सिस्टम को रूस ने 28 अप्रैल, 2007 को तैनात किया था। मौजूदा दौर का यह सबसे अडवांस एयर डिफेंस सिस्टम है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक इजरायल और अमेरिका का मिसाइल डिफेंस सिस्टम भी मजबूत है, लेकिन उनके पास लॉन्ग रेंज की मिसाइलें हैं। इसकी बजाय रूस के पास कम दूरी में मजबूती से मार करने वाला मिसाइल डिफेंस सिस्टम है। यह एयरक्राफ्ट्स को मार गिराने में सक्षम है, जिसके जरिए अटैक का भारत पर खतरा रहता है।

एस-400 डिफेंस सिस्टम को और घातक बना रहा रूस
रूस ने अपने एस-400 और एस-300 मिसाइल सिस्टम को और घातक बनाने का काम शुरू कर दिया है। इस सिस्टम में रूस नई तरह की कई मिसाइलों को शामिल करने जा रहा है जो दुश्मन के किसी भी मिसाइल को मार गिराने में सक्षम होंगी। रूस का यह हथियार अपनी कैटेगरी में दुनिया में सबसे बेहतरीन माना जाता है। रूसी समाचार एजेंसी स्पूतनिक की रिपोर्ट के अनुसार, रूसी रक्षा मंत्रालय ने एस- 300 और एस- 400s के स्टॉक को लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता को बढ़ाने और अत्यधिक सटीक शॉर्ट-रेंज डिफेंस प्रदान करने के लिए विभिन्न प्रकार की मिसाइलों से लैस करने की योजना को मंजूरी दी है। रूसी सेना के अनुसार, लॉन्च प्लेटफार्मों में इस बदलाव से स्थिति के आधार पर इस्तेमाल की जाने वाली मिसाइलों को तुरंत स्विच करना संभव हो जाएगा।

रूसी सेना के पास इतने एस-400 सिस्टम मौजूद
मंत्रालय ने यह भी कहा है कि किसी भी एयर डिफेंस सिस्टम से अपेक्षा की जाती है कि वे घरेलू एयर डिफेंस की क्षमताओं में मौलिक रूप से वृद्धि करें और किसी भी लक्ष्य को नष्ट करने के लिए एक सुरक्षित प्रणाली का निर्माण करें। बता दें कि रूस की एयर डिफेंस फोर्स एस- 300 की कम से कम 125 बटालियन (कुल 1,500 लांचर) और एस- 400 की 55 बटालियन (552 लांचर) से लैस हैं। योजना के अनुसार, एस -300 की चार बड़ी लॉन्च ट्यूबों में से एक या अधिक को चार छोटे 9M96 और 9M96M मिसाइलों के साथ बदला जाएगा। इन मिसाइलों की रेंज 30 से 120 किमी की होगी। ये मिसाइलें 20 से 35 किमी की ऊंचाई पर दुश्मन की मिसाइलों को नष्ट करने में सक्षम होंगी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रूस के एस्ट्राखान क्षेत्र में एयरोस्पेस फोर्सेस के 185वें सेंटर फॉर कॉम्बैट ट्रेनिंग के दौरान इसका सफल ट्रायल भी किया गया है।

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